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महापुरुषों के विचार

महापुरुषों के विचार

राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। – अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है। – बाबूराम सक्सेना।

समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। – (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर।

हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। – शंकरराव कप्पीकेरी।

अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल।

राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। – अनंत गोपाल शेवड़े।

दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। – के.सी. सारंगमठ।

हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। – वी. कृष्णस्वामी अय्यर।

राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। – बालकृष्ण शर्मा नवीन।

विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। – वाल्टर चेनिंग।

हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये। – बेरिस कल्यएव।

अंग्रेजी सर पर ढोना डूब मरने के बराबर है। – सम्पूर्णानंद।

एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित। – केशवचंद्र सेन।

देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है। – सेठ गोविंददास।

इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। – राहुल सांकृत्यायन।

समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है। -सर जार्ज ग्रियर्सन।

मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। – चंद्रबली पांडेय।

भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है। – नलिनविलोचन शर्मा।

जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी। – (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।

यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। – शिवनंदन सहाय।

प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है। – (राजा) कीर्त्यानंद सिंह।

अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। – भवानीदयाल संन्यासी।

यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? – चंद्रशेखर मिश्र।

साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। – महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।

जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। – (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।

भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है। – टी. माधवराव।

हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है। – र. रा. दिवाकर।

यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं। – राजेन्द्र प्रसाद।

उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है। – मुहम्मद हुसैन आजाद।

समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। – जनार्दनप्रसाद झा द्विज।

मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए। – राहुल सांकृत्यायन।

शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। – शिवप्रसाद सितारेहिंद।

हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है। – (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।

वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके। – पीर मुहम
्मद मूनिस।

भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहँुचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा। – शिवपूजन सहाय।

चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै। – बेनी कवि।

यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा। – ब्रजनंदन दास।

देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। – साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।

हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है। – छविनाथ पांडेय।

देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है। – रविशंकर शुक्ल।

हमारी नागरी दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है। – राहुल सांकृत्यायन।

नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। – गोपाललाल खत्री।

साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। – गणेशशंकर विद्यार्थी।

अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती। – पं. कृ. पिल्लयार।

उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा। – शारदाचरण मित्र।

हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है। – जगन्नाथप्रसाद मिश्र।

हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है। – देवव्रत शास्त्री।

हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता। – गोविन्दवल्लभ पंत।

भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है। – रविशंकर शुक्ल।

किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।

हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय। – ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह।

भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है। – माधव शुक्ल।

संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है। – डॉ. फादर कामिल बुल्के।

भाषा विचार की पोशाक है। – डॉ. जानसन।

रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है। – यशोदानंदन अखौरी।

साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है। – रामवृक्ष बेनीपुरी।

कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं। – श्रीनारायण चतुर्वेदी।

हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। – राजेंद्रप्रसाद।

देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है? – शिवपूजन सहाय।

जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। – देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप। – राधाचरण गोस्वामी।

हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है। – शारदाचरण मित्र।

हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है। – कमलापति त्रिपाठी।

मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता। – मनोरंजन प्रसाद।

हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। – सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।

नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है। – (प्रो.) तान युन् शान।

राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है। – कमलापति त्रिपाठी।

सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए। – श्रीधर पाठक।

भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है। – शारदाचरण मित्र।

हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। – ध

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