दिव्य जीवन

दिव्य जीवन की कुंजी !

साबरमती के गाँधी आश्रम की घटना है। किसी रात्रि को आश्रम में चोर घुसा। वह कुछ माल-सामान की, चीज-वस्तुओं की सफाई करे, चोरी करे उससे पहले किसी आश्रमवासी की नजर पड़ गई। वह सोया-सोया निहारता था। देखा कि वास्तव में चोर है। धीरे से साथी को जगाया, दूसरे को जगाया, तीसरे को जगाया। चार-पाँच मित्र जगे और चोर को घेरकर पकड़ लिया। थापा-थूपी करके कमरे में बन्द कर दिया।

सुबह में प्रार्थना पूरी हुई, नास्ता आदि सब हो गया। फिर उस चोर को निकाल कर गाँधी जी के पास लाये। आश्रम के संचालक आदि ने सोचा था कि बापू चोर को कुछ सजा देंगे या पुलिस में भिजवा देंगे। गाँधी जी के सामने चोर को खड़ा कर दिया। रात की घटना बतायी।

सब सोच रहे थे कि गाँधी जी अब इसको डाँटेंगे अथवा कुछ सीख देंगे या प्रायश्चित करायेंगे, परंतु गाँधीजी ने जो कहा वह आश्चर्यजनक था। उन्होंने संचालक से पूछाः

“इसने नास्ता किया है कि नहीं किया ?”

“बापू ! यह चोर है।”

“चोर तो है लेकिन मनुष्य तो है न ? यह पहले मनुष्य है कि पहले चोर है ? पहले यह मनुष्य है। इसको भूख लगी होगी। इसको ले जाओ, नास्ता कराओ। बेचारे को भूख लगी होगी।”

बाहर की प्रीति की चीजें तुम्हें अन्दर के राम के साथ प्रीति जोड़ने को कहती हैं और अन्दर के राम की प्रीति फिर चोर का भी कल्याण करने लगती है। उनके द्वारा साहूकार का कल्याण हो जाय इसमें क्या बड़ी बात है ?

वह चोर फूट-फूटकर रोने लगा। पछतावा करने लगा। न डंडे की जरूरत पड़ी, न पुलिस की जरूरत पड़ी न रिमान्ड की जरूरत पड़ी। वह चोर सुधर गया।

प्रेम ऐसी चीज है। अन्यथा, गाँधी जी के पास कौन-सा आडम्बर और फर्नीचर था कि लोग सुधर जाते या उनका कहना मानते, उनके अनुगामी बनते ? अत्यंत सादा जीवन था गाँधी जी का। वे अपने पर आधारित थे।

आप जितना सादा जीवन जीते हैं और आत्मनिर्भर होते हैं उतना आपका आत्मप्रेम, आत्मरस जगता है। आप जितने बाहर की चीजों पर आधारित रहते है उतने भीतर से बेईमान होते चले जाते हैं। अगर आप सच्चे हृदय से प्यार करो तो आपकी एक मुस्कान हजारों आदमियों को उन्नत कर देगी। आपका निर्दोष, निष्कपट हास्य पूरी सभा को उन्नत कर देगा। सबकी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति होगी। आपका हास्य मात्र पर्याप्त है।

जिन महापुरूषों से लाखों लोग लाभान्वित होते हैं, उन पुरूषों ने क्या तुम्हें ऐहिक वस्तुओं की सुविधा देकर, चापलूसी करके लाभान्वित किया है ? नहीं। वे पुरूष आत्मनिर्भर रहे है, स्वतंत्र आत्मसुख में प्रविष्ट हुए हैं और वह आत्मसुख बाँटने की योग्यता उनमें विकसित हो गई है। वे आत्मसुख से स्वयं सराबोर रहते हैं और उसी में गोता लगाकर निगाह डाल देते हैं या दो शब्द बोल देते हैं तो हजारों-हजारों दिल उनके हो जाते हैं। सारा संसार उनके लिए बदला हुआ मिलता है।

मरने के सब इरादे जीने के काम आये।

हम भी तो हैं तुम्हारे कहने लगे पराये।।

तुम ईश्वर के लिए अगर बाह्य सब चीजों का आकर्षण छोड़ देते हो, ईश्वर प्राप्ति के लिए मरने को भी तैयार हो जाते हो तो तुम्हारी मौत नहीं होगी। तुम्हारे मरने के सब इरादे जीवन में बदल जाएँगे, सब दुःख सुख में बदल जाएँगे। केवल जीवन जीने का ढंग हम जान लें। वह ढंग हमें शास्त्र सिखाते हैं।

शास्त्र का मतलब हैः “शासनात् शास्त्रम् – जो शासन करे, कहे कि यह करो, यह मत करो, वह शास्त्र कहलाता है।

मन पर, इन्द्रियों पर शासन करके, सब स्थानों से आसक्ति छुड़वाकर हमें अपने घर पहुँचा दें, अपने आत्मपद में ला दें वे हैं शास्त्र। शास्त्र कोई बोझ ढोने के लिए नहीं हैं।

आज संस्कृत के एक बड़े विद्वान आये थे। आचार्य थे। पहले काशी में रहते थे, आजकल अहमदाबाद की किसी संस्था में रहते हैं। आश्रम के बालयोगी नारायण को भारतीय तर्कशास्त्र, न्यायदर्शन आदि पढ़ाने के लिए सोचा था इस सिलसिले में आये थे। वे कहने लगेः “इनको लघु कौमुदी और मध्यमा तक पढ़ाओ। यह सब रटेंगे तब न्यायशास्त्र आदि पढ़ेंगे। शास्त्र रटना भी तो भजन है।”

मैंने सोचा यह बात तो ठीक है लेकिन रटने का भजन नहीं करवाना है, अब तो रसमय भजन करवाना है। शास्त्र रट-रटकर तो कई खोपड़ियाँ भरी हुई हैं। एक खोपड़ी में नहीं रटा जायगा तो भी काम चल जायेगा।

कोई सोचता है हम इतने शास्त्र रट लेंगे, इतने प्रमाणपत्र पा लेंगे तो हमारा प्रभाव पड़ेगा, हम आचार्य बन जाएँगे, वेदान्ताचार्य, दर्शनाचार्य आदि। आचार्य कहलाने के लिए शास्त्र पढ़ो, मजदूरी करो, इससे तो न पढ़ो वह अच्छा है। सेठ कहलाकर मान पाने के लिए धन कमाओ, मजदूरी करो इससे तो धन थोड़ा कम रहे तो भी अच्छा है। साहब कहलाने के लिए, प्रमोशन पाने के लिए चिंतित रहो इससे तो जहाँ हो वहीं अच्छे हो।

‘मेरा पति अच्छा है क्योंकि गहने और वस्त्र-आभूषण अच्छे ला देता है….’ ऐसा कहलवाने के लिए ला देते हो तो कोई आवश्यकता नहीं लाने की।

‘मेरी पत्नी अच्छी है….’ यह कहलवाने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के गरमागरम चरपरे व्यंजन-पकवान-वानगियाँ, अधिक तेल-मिर्च-मसालेवाले पदार्थ पति को खिलाओगे तो इससे पति का भी सत्यानाश होगा और पत्नी का भी सत्यानाश होगा।

परिवार में आप एक दूसरे के आध्यात्मिक साथी बन जाओ, आत्मसुख की ओर उन्नति करने के लिए एक दूसरे को सहयोग दो। एक दूसरे के सच्चे सुहृद, सच्चे हितैषी हो जाओ। पत्नी सोचे कि कौन-से भोजन से मेरे पति का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा, फिर वैसा ही भोजन बनाया करे। जो पत्नी चाहे कि अपने पति का स्वास्थ्य अच्छा रहे, मनोबल विकसित हो, विचारबल विकसित हो, प्राणबल विकसित हो, पति की साधना में उन्नति हो, और उसके अनुरूप आचरण करे तो वह पत्नी के साथ-साथ श्रेष्ठ मित्र भी हैं और श्रेष्ठ गुरू भी है।

जो पति चाहे कि पत्नी आत्मनिर्भर रहे, विकारी सुख नहीं अपितु निर्विकारी आत्मसुख की ओर चले, इसके लिए उसे पवित्र स्थानों में ले जाय, पवित्र चिन्तन कराये, आत्मसुख में प्रीति जगाये, हल्के विचार कम करने में सहयोग दे वह पति उस नारी के लिए पति भी है, गुरू भी है और परमात्मा भी है।

परस्पर हितैषी हो जाओ, बस। जो प्रेम व्यक्ति में केन्द्रित रह जाता है वह आत्म-केन्द्रित हो जाय, बस। आत्म-केन्द्रित माने क्या ? स्व-केन्द्रित या स्वार्थी ? नहीं। जो प्रेम शरीर में है वह शरीर जिससे प्रेमास्पद लगता है उसकी तरफ प्रेम हो तो पति-पत्नी का सम्बन्ध बड़ा मधुर सम्बन्ध है। भारत के दूरदर्शी, परम हितैषी महान् आत्माओं का कहना है कि शादी करनी चाहिए, दो चार बच्चों को जन्म देना चाहिए।

जो लोग शराबी कबाबी हैं वे लोग चाहे मँगनी से पहले ऑपरेशन करा लें किन्तु जो लोग भगवान का भजन करते है, जप करते हैं, ध्यान करते हैं उन्हें कभी ऑपरेशन नहीं कराना चाहिए। उन्हें संयमी जीवन जीना चाहिए। दो-चार बच्चे हों। एकाध देश की सीमा पर हो, फौज में काम आ जाय, एकाध समाजसेवा में हो। देश को ऐसे बच्चों की जरूरत है।

दिव्य आत्माएँ धरती पर आना चाहती हैं लेकिन हमारे अन्तःकरण दिव्य हों तब न ? आप जितना-जितना उन वस्तुओं से उपराम होते जाते हो उतना-उतना अन्तःकरण उन्नत होता जाता है और उतनी उन्नत आत्माएँ आपके घर अवतरित होने को तैयार होती हैं। ऐसी पवित्र आत्माएँ आमंत्रित करने से ही देश की सच्ची सेवा हो सकती है, विश्व की सेवा हो सकती है। नारायण…. नारायण….. नारायण….. नारायण….।

श्रीमद् भागवत में आया है कि आचार्य में सब देवों का निवास होता है। आचार्य कौन हैं ? जो तुम्हारे मन को ईश्वर की तरफ लगा दें, तुम्हारी निम्न वासनाओं को हटाकर प्रियतम परमात्मा की तरफ मोड़ दें।

आचार्य में पूज्यबुद्धि होने से तुम्हारा अन्तःकरण पावन बनता है। आचार्य के उपदेश को आदर से, स्नेह से सुनकर अपने जीवन में लाने का जीवन उन्नत होता है। भगवान ने भागवत में कहा हैः

आचार्यं मां विजानीयात्।।(11.17.26)  ‘मुझे ही आचार्य जानो।’

उन आचार्यों का पूर्वजीवन देखो तो उन्होंने संध्या-उपासना-जप-तप-यज्ञयागादि किये हैं, पुण्य कर्म किये हैं। धारणा-ध्यान-समाधि आदि योगाभ्यास किया है, उन्नत बने हैं, तभी वे आचार्य हुए हैं।

उन्नति किसी व्यक्ति के पास, किसी दायरे में, किसी सम्प्रदाय में या समाज में ही होती है ऐसी बात नहीं है। उन्नति तो जो चाहे कर सकता है। आपके अन्दर जो उन्नति करने के दृढ़ संकल्प हैं वे ही संकल्प देर-सवेर आपके लिये उन्नति की सामग्री पूरी करेंगे। हाँ, अगर आप सचमुच उन्नत होना चाहो तो। आप विलासी जीवन जीकर सुखी होने की गड़बड़ करते हो तो वैसी जगह आपको मिलेगी। आप दिव्य जीवन जीना चाहते हो तो वैसी जगह आपको मिलेगी। आप दिव्य जीवन जीना चाहते हो तो देर-सवेर वही वातावरण और वही सामग्री खिंचकर आयेगी क्योंकि तुम्हारा मन सत्य-संकल्प आत्मा से स्फुरित होता है। इसलिए कृपानाथ ! जो भी संकल्प करो वह विलासियों को देखकर नहीं, आडम्बरियों को देखकर नहीं, विकरारियों को देखकर नहीं, बाहर से जो खुशहाल नजर आते हैं और भीतर से चिन्ता की आग में पचते हैं ऐसे लोगों को देखकर नहीं, विकारियों को देखकर नहीं, बाहर से जो खुशहाल नजर आते हैं और भीतर से चिन्ता की आग में पचते हैं ऐसे लोगों को देखकर नहीं। आप तो शंकराचार्य को, कबीरजी को, नानकजी को, बुद्ध को, महावीर को, शबरी को, मीरा को, गार्गी को, मदालसा को, रामतीर्थ को, रामकृष्ण को, रमण महर्षि को, लीलाशाह भगवान को याद करके अपना संकल्प करो कि मेरे ऐसे दिन कब आएँगे जब मैं आत्मनिर्भर हो जाऊँगा। कोई वस्त्र नहीं फिर भी कोई परवाह नहीं गार्गी को। शुकदेव जी की कौपीन का ठिकाना नहीं, ऐसे बेपरवाह और आत्मसुख में डूबे हुए सात दिन में परीक्षित को आत्म-साक्षात्कार करा दिया।

जनक के पास इतनी सारी सामग्री है फिर भी कोई आसक्ति नहीं। बिल्कुल अनासक्त योग।

वस्तुएँ त्यागने को मैं नहीं कहता। वस्तुएँ बढ़ाने को भी मैं नहीं कहता। मैं कहता हूँ कि तुम्हारा और वस्तुओं का ऐसा सम्बन्ध है कि जैसे बच्चे को चालनगाड़ी दी जाती है। तुम्हारा और संसार का ऐसा सम्बन्ध है कि जैसा तुम्हारे शरीर और कपड़ों का।

कपड़े तुम्हारे लिए हैं, तुम कपड़ों के लिए नहीं हो। वस्तुएँ तुम्हारे लिए हैं, तुम वस्तुओं के लिए नहीं हो। भगवान का भक्त होकर टुकड़ों की चिन्ता करे ?

आज मनुष्य की इतनी बेईज्जती हो गई है कि क्या बताएँ….। मुर्गी के बच्चे बढ़ाने के लिए देश लाखों-करोड़ों रूपये खर्च कर रहा है। मछली के बच्चों का विकास करने के लिए करोड़ों रूपये दिये जा रहे हैं लेकिन मनुष्य के बच्चों का नाश करने के लिए करोड़ों रूपये लगाये जा रहे हैं। मुर्गी के बच्चे चाहिए, मछली के बच्चे चाहिए लेकिन मनुष्य के बच्चों का कोई मूल्य नहीं है। मनुष्य इतना तुच्छ हो गया ? इतना असंयमी, विलासी हो गया ? उसको जन्म लेने से रोकने के लिए करोड़ों रूपये खर्च करना पड़े ? इन्सान के बच्चे की कीमत नहीं रही।

क्यों ?

क्योंकि इन्सान अपने संयम से, अपने सदाचार से, अपने आत्मसुख और आत्मज्ञान के मार्ग से च्युत हो गया, गिर गया। सरकार बेचारी क्या करे ? नारायण….. नारायण…… नारायण….।

 


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